Monday, 6 August 2012


 
                  वो


अपनी नज़र से लिख-लिख कर
वो ज़ज्बातों को पढ़ाती है
मुझको भी अच्छा लगता है
जब वो मुस्कराती है
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बड़ी-बड़ी उसकी आंखें
लब उसके गुलाबी हैं
मेरे लफ़्ज़ों को अपने लफ़्ज़ों से
अक्सर वो रंग जाती है
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बाग में फूलों से मिलने
वो तितली बनकर जाती है
कलियों को भी अपनी शक्ल  से
वो बड़े प्यार से लुभाती है
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चाँद में चांदनी बनकर
जब वो  रात को छुप जाती है
रोशनी से अपनी मोहब्बत की
वो सारा जग जगमगाती है
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दिन भर सुनहली किरण सी
वो हर घर में शोर मचाती है
अँधेरे की उदासी को भी  वो
अपने उजाले से  मिटाती है 
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बादल अपनी बातों के
आसमां में वो उड़ाती है
और जहाँ भी बरसात नहीं होती
वहां पर बरसात लाती है
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चट्टानों और मैदानों में
नदिया सी वो लहराती है
झरने सा एक मधुर गीत
वो ही पहाड़ी से गाती है
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अपनी नज़र से लिख-लिख कर
वो ज़ज्बातों को पढ़ाती है
मुझको भी अच्छा लगता है
जब वो मुस्कराती है
 

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